यूरोपीय कम्पनियों का भारत में आगमन | THE ENTRANCE OF EUROPEAN COMPANIES IN INDIA

भारत में मुख्यतः दो भागों से विदेशी प्रवेश कर सकते थे-प्रथम उत्तर-पश्चिम सीमा को पार कर स्थल-मार्ग और द्वितीय समुद्री-मार्ग द्वारा

यूरोपीय कम्पनियों का भारत में आगमन (THE ENTRANCE OF EUROPEAN COMPANIES IN INDIA)

(पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रान्सीसी तथा डेन्स)

भारत में मुख्यतः दो भागों से विदेशी प्रवेश कर सकते थे-प्रथम उत्तर-पश्चिम सीमा को पार कर स्थल-मार्ग और द्वितीय समुद्री-मार्ग द्वारा । गजनी, गारे, समरकन्द और काबुल से मुसलमानों ने स्थल-मार्ग से प्रवेश करके भारत पर आक्रमण किया था। मुगल साम्राज्य के शासकों ने एक बड़ी सेना तो रखी थी, किन्तु समुद्र-मार्ग की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली जल-सेना के निर्माण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। आधुनिक भारत की शक्तियों में केवल मराठों ने ही इस तरफ ध्यान दिया था। यूरोप की व्यापारिक जातियों ने समुद्री मार्ग से ही भारत में प्रवेश किया था और अन्ततः भारत के इतिहास को एक नया मोड़ दिया।

यूरोपीय कम्पनियां
यूरोपियन कम्पनियों का भारत में आगमन 

वैसे तो भारत का यूरोप के साथ व्यापारिक सम्बन्ध प्राचीन काल से ही रहा है। स्थल और जल दोनों ही व्यापारिक मार्ग के रूप में प्रयोग किये जाते रहे थे। स्थल-मार्ग बालकान प्रदेशों से टर्की, फारस, ईरान, इराक होता हुआ अफगानिस्तान पहुँचता था, फिर खैबर, कुर्रम, बोलन, गोमल आदि दरों से होता हुआ भारत तक पहुँचता था। दूसरी ओर जल-मार्ग,भूमध्य सागर अथवा काला सागर द्वारा लाल सागर, फारस की खाड़ी और अरब सागर होता हुआ भारत पहुँचता था। ये व्यापारिक मार्ग 14वीं शताब्दी तक निर्विरोध चलते रहे। किन्तु ज्यों-ज्यों 15वीं शताब्दी में अरबों का प्रसार और प्रभाव बढ़ता गया, त्यों-त्यों ये मार्ग असुरक्षित होने लगे। बाद में तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया जीत लिया और धीरे-धीरे सम्पूर्ण दक्षिण-पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्वी यूरोप पर अधिकार कर लिया। इससे यूरोप के एशिया व पूर्वी देशों से व्यापार करने के स्थल-मार्ग पर उनका एकाधिपत्य हो गया और ये मार्ग यूरोपीय जातियों के लिए बिल्कुल बन्द हो गये। इस कारण यूरोपीय देशों को भारत और पूर्वी एशिया के देशों से व्यापार करने के लिए जल-मार्ग की खोज करने की आवश्यकता हुई। यूरोप गर्म-मसालों के लिए दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों पर निर्भर करता था। इस कारण नवीन जल-मार्ग की खोज उनके लिए आवश्यक थी। उनके विचार से भारत एक ऐसा देश था जो धनवान था और जहाँ से वे गर्म-मसाले भी प्राप्त कर सकते थे। इस कारण भारत से व्यापार करने की उनकी इच्छा प्रबल थी। पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थ्यांश में हुई कुछ भौगोलिक खोजों का संसार के विभिन्न देशों के व्यापारिक सम्बन्धों पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन खोजों से संसार के अनेक देशों में आपसी सम्पर्क स्थापित हुए। इसी प्रयास में कोलम्बस स्पेन से भारत के लिए समुद्री मार्ग खोजने चला था किन्तु 1492 में अमरीका पहुँच गया। इस प्रकार, अमरीका की खोज हुई। बार्थोलोम्यू डियाज (Bartholomew-Diaz) 1487 में 'आशा अन्तरीप' (अफ्रीका का अन्तिम किनारा), जिसे उसने 'तूफानी अन्तरीप' (Cape of Good Hope) कहा, पहुँच गया था। उसके 10 वर्ष के बाद 1897 में दूसरा पुर्तगाली कैप्टन 'वास्कोडिगामा' (Vasco da Gama) पुर्तगाल से चलकर इसी आशा अन्तरीप को पार करता हुआ आगे पूर्व की ओर बढ़ा और अब्दुल मनीद नामक गुजराती पर्थ-प्रदर्शक की सहायता से 17 मई, 1498 को भारत के पूर्वी तट स्थित बन्दरगाह 'कालीकट' (Calicut) पहुँच गया। इस प्रकार भारत के लिए एक नया यूरोपीय समुद्री-मार्ग खोजा गया। इसे 'केप ऑफ गुड होप मार्ग' (Cape of Good Hope Route) नाम दिया गया।

बाद में भारत आकर यूरोपियों को यह पता लगा कि गर्म-मसालों के लिए भारत नहीं बल्कि दक्षिण-पूर्वी एशिया के अन्य देश, जैसे जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, मलाया आदि अधिक उपयुक्त थे। परन्तु भारत इन देशों से व्यापार करने की एक कड़ी हो सकता था। साथ ही भारत राजनीतिक दृष्टि से दुर्बल था जहाँ वे अपनी आकांक्षाओं की सरलता से पूर्ति कर सकते थे। इस कारण इन यूरोपीय जातियों ने भारत में रहने और उसे अपने अधीन करने का प्रयत्न किया।

भारत की तत्कालीन राजनीतिक दुर्बलता के कारण इन यूरोपीय जातियों ने यह भी अनुभव किया कि भारत के शासकों और एक-दूसरे से बचने के लिए उन्हें केवल अपनी ही शक्ति पर निर्भर करना होगा। इस कारण इन यूरोपीय जातियों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी आरम्भ हुई और इनके झगड़े न केवल भारतीय शासकों से ही हुए बल्कि आपस में भी हुए, जिनका अन्तिम परिणाम भारत में अंग्रेजी शासन की स्थापना था। अतः भारत में यूरोपीय जातियों के आने का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक था। कुछ अंग्रेज इतिहासकारों ने यह सिद्ध करने का प्रयत्ल किया है कि यूरोप-निवासियों का भारत आना एक श्रेष्ठ सभ्यता का प्रसार (civilization on the march) था। परन्तु यह कहना सर्वथा एक भूल है। निस्सन्देह, बाद के समय में शक्तिशाली यूरोप की विचारधारा और सभ्यता ने भारत को ही क्या सम्पूर्ण एशिया और अफ्रीका को भी प्रभावित किया परन्तु यूरोप-निवासियों का प्रारम्भिक उद्देश्य सभ्यता का प्रसार था, यह पूर्णतया असत्य है। यूरोप-निवासी भारत में केवल व्यापार और धन की लालसा से आये थे, किन्तु बाद में भारत की तत्कालीन परिस्थितियों के कारण वे यहाँ पर साम्राज्य स्थापित करने की लालसा उनमें जाग्रत हो गयी और उनमें से एक ने यहाँ अपने साम्राज्य की स्थापना की और यहाँ की सभ्यता को प्रभावित किया।

1. पुर्तगाली(THE PORTUGUESE)

प्रथम यूरोपियन, जिसने यूरोप से भारत के लिए सीधे समुद्री मार्ग की खोज की, वास्को डि-गामा पुर्तगाली नागरिक था। वह सबसे पहले 1498 में कालीकट पहुँचा, जहाँ के हिन्दू शासक 'जमोरिन' (उनकी पैतृक उपाधि) ने स‌द्भावपूर्ण ढंग से उसका स्वागत किया। वास्को डि-गामा पुर्तगाल के शासक के प्रतिनिधि के रूप में भारत आया था।

पुर्तगाली शक्ति का विस्तार (Expansion of Portuguese Power)

वास्को डि-गामा ने यहाँ आकर कालीकट के हिन्दू-शासक जमोरिन से पुर्तगालियों के लिए व्यापार करने की सुविधाएँ प्राप्त कीं और उसी समय से पुर्तगालियों का भारत में व्यापार आरम्भ हुआ। उन्होंने जमोरीन को उसके शत्रु-राज्यों मुख्यतः कोचीन राज्य के विरुद्ध सहायता देना भी आरम्भ किया और इस प्रकार भारत की राजनीति में हस्तक्षेप किया। उसने 1502 ई. में कोचीन में फैक्टरी बनाई जो भारत में स्थापित पहला-दुर्ग था। वास्को डि-गामा के बाद भारत में पुर्तगाली शक्ति की वास्तविक नींव डालने वाला 'अलफांसो डि अलबुकर्क' था, जो एक छोटे जहाजी बेड़े का नायक बनकर 1503 ई. में पहली बार भारत आया था। उसने 1505 ई. में कुन्नूर में दूसरा दुर्ग स्थापित किया। इस रूप में उल्लेखनीय कार्य करने पर उसे 1509 ई. में भारत में - पुर्तगाली गतिविधियों का गवर्नर नियुक्त किया था।

फ्रांसिसो-डि-अल्मीडा (Francisco de Almeida) - अल-बुकर्क के बाद पुर्तगाली * सरकार ने निश्चित किया कि भारत के मामलों की देखभाल करने हेतु एक वायसराय (गवर्नर) नियुक्त किया जाय। अल्मीडा भारत में पहला पुर्तगाली गवर्नर था। वह 1505 ई. से 1509 ई. ● तक भारत में गवर्नर के रूप में रहा।

उसने भारत में पुर्तगाली राज्य स्थापित करने का प्रयत्न आरम्भ किया और अंजाडीवा (Anjadiva), कैन्नूर (Cannanore) तथा कोचीन (Coachin) में दुर्ग स्थापित किये। उसने 1509 ई. में अल्मीड़ा ने गुजरात और मिस्र के संयुक्त बेड़े को पराजित किया। इस विजय के परिणामस्वरूप पुर्तगाली नौसेना हिन्द महासागर में सबसे ज्यादा शक्तिशाली हो गयी।

हिन्द महासागर में पुर्तगालियों की बढ़ती शक्ति को चुनौती देने के लिए 'गुजरात-तुर्की मित्रता' की स्थापना भी हुई। किन्तु कुछ समय बाद यह मित्रता टूट गयी और हिन्द महासागर में पुर्तगालियों के प्रभाव को रोक पाने में वे असमर्थ रहे। वास्तव में अल्मीडा का उद्देश्य पुर्तगालो के दक्षिण-पूर्वी एशिया (South-East Asia) के व्यापार की सुरक्षा करना था। इसके बाद 1509 में अलबुकर्क को द्वितीय गवर्नर नियुक्त किया गया।

अलफांसो डि अलबुकर्क (Alfanso de Albuquerque) - अलबुकर्क को 1509 में भारत के पुर्तगाली गतिविधियों का गवर्नर नियुक्त किया गया। वह भारत में 1509 ई. से 1515 ई. तक रहा। उसने सर्वप्रथम 1510 ई. में गोवा पर अधिकार कर लिया, जो एक समुद्री बन्दरगाह था और बीजापुर की सल्तनत के अधीन था। धीरे-धीरे उसने ड्यू, दमन, सालसट, बेसीन, चौल, मुम्बई, मद्रास के निकट सैनफैल और बंगाल में हुगली पर पैर जमाये ।

अपने कार्यकाल में अलबुकर्क ने गोवा के दुर्ग को मजबूत करने और उसके व्यापारिक महत्व को बढ़ाने की पूरी कोशिश की थी। एक स्थायी पुर्तगाली बस्ती बसाने के विचार से उसने स्वदेशवासियों को भारतीय स्त्रियों से विवाह करने को प्रेरित किया। किन्तु उसकी इस नीति में एक दोष था कि वह मुसलमानों को बहुत परेशान करता था। उसका कहना था कि वह भारत में हिन्दुओं को मुसलमानों से बचाने आया था और बदले में वह भारत के व्यापार पर पुर्तगाल का एकाधिपत्य माँगता था। अलबुकर्क ने गोवा में सती प्रथा नामक बुराई को समाप्त किया। इस प्रकार, वह राजा राममोहन राय का पूर्वगामी था जिनके प्रयलों से विलियम बैंटिक ने 1829 में 'सती-प्रथा' की कुप्रथा को समाप्त किया था। 1515 ई. में मलक्का पर भी पुर्तगालियों का अधिकार हो गया तथा 1515 ई. में ही उसने हरभुज (फारस की खाड़ी का मुहाना) पर भी पुर्तगाली कब्जा करा दिया था।

जब 1515 ई. में उसकी मृत्यु हुई उस समय तक पुर्तगाली भारत की सबसे शक्तिशाली जलशक्ति बन चुके थे और पश्चिमी तट पर इनकी ही तूती बोलती थी। अलबुकर्क की भारत में नीति के अग्रलिखित मुख्य उद्देश्य थे-

1. वह यूरोप से भारत के मार्ग के बीच में पड़ने वाले सभी व्यापारिक स्थानों को अप अधिकार में करना चाहता था।

2. वह स्थानीय निवासियों के साथ पुर्तगालियों के विवाह कराकर पुर्तगाली उपनिवेशे की स्थापना करना चाहता था। 

3. जहाँ वह उपनिवेश स्थापित नहीं कर सकता था अथवा अधिकार नहीं कर सक था वहाँ वह समुद्र-तट पर शक्तिशाली किले बनाकर पुर्तगाल के जल-मार्ग की सुरक्षा करना चाहता था।

4. जहाँ यह भी सम्भव न था वहाँ पर वह स्थानीय शासकों से पुर्तगाल के राजा भी सत्ता को स्वीकार करने की माँग करता था।

इस प्रकार एलबुकर्क के उद्देश्य विस्तृत थे और उसने अपने थोड़े से कार्यकाल में इनकी पूर्ति में पर्याप्त सफलता भी पायी। मुख्यतः उसने भारत में पुर्तगाली शक्ति को सुदृढ़ किया। उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी पुर्तगालियों को पर्याप्त सफलता मिली और धीरे-धीर समुद्र के निकट कुछ बस्तियाँ कायम कीं जिनमें पश्चिमी तट पर दमन, ड्यू, सालीसट, बेसीन, चौल और बम्बई, बंगाल में हुगली और मद्रास-तट पर 'सान-थोम' प्रमुख थीं। लंका के बड़े भाग पर भी उन्होंने अपना अधिकार कर लिया। पूर्वी द्वीप समूहों पर भी व्यापार बढ़ाया। 1530 ई. में पुर्तगालियों ने गोवा को अपने भारतीय राज्य की राजधानी बना लिया। 1535 ई. में दीव और 1559 ई. में दमन पर भी उनका आधिपत्य स्थापित हो चुका था। पुर्तगालियों के पास लगभग 50 दुर्ग थे और 100 से अधिक जहाजी बेड़े थे।

पुर्तगाली अपने भारतीय भूभाग की लम्बे समय तक रक्षा न कर सके। ज्यों-ज्यो यूरोपवासियों की अन्य कम्पनियाँ व्यापार करने के लिए भारत आने लगीं और पारस्परिक व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ती गयी, पुर्तगाली मैदान छोड़ते गये। उनके अधिकार में केवल गोवा, दमन और दीव रह गये, जहाँ 1961 ई. तक उनका शासन रहा।

पुर्तगालियों की सफलता (Success of the Protuguese)

पुर्तगालियों की भारत में सफलता के अनेक कारण थे। पुर्तगालियों के आगमन के समय हिन्द महासागर के तटीय भाग की राजनीतिक आर्थिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। 15वीं शताब्दी में पुर्तगाली शासक डॉन हेनरीक (Prince Henry, nickname the Navigator') ने भारत के लिए एक सीधे मार्ग की खोज में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया। हेनरीक अपने यूरोपीय और अरब व्यापारिक प्रतिद्वन्द्वियों को पीछे छोड़ना चाहता था तथा अफ्रीका एवं एशिया के काफिरों को ईसाई बनाकर तुर्कों एवं अरबों की बढ़ती हुई शक्ति को सीमित करना चाहता था।

पोप ने भी उनके इन प्रयासों का समर्थन किया। 1492 ई. में पोप अलेक्जेण्डर षष्ठम् ने एक 'आज्ञा-पत्र' जारी करके पूर्वी समुद्रों में व्यापार करने का एकाधिकार पुर्तगाल को प्रदान कर दिया था। उस आज्ञापत्र के विरुद्ध कार्य करने का साहस यूरोप का कोई भी ईसाई राज्य नहीं कर सकता था। बाद में पोप जूलियस द्वितीय ने 1506 ई. में तथा पोप लुई दशम् ने 1514 ई. में इसी आज्ञा-पत्र को दोहरा दिया। इस कारण 16वीं सदी में पुर्तगाली भारत के व्यापार और राजसत्ता के लिए प्रयत्न करने वाली एकमात्र यूरोपीय शक्ति थे।

पुर्तगालियों की इस प्रारम्भिक सफलता के विभिन्न कारण थे। भारत में छोटे-छोटे राज्यों में परस्पर झगड़े थे जिनका उन्होंने लाभ उठाया। पुर्तगाली प्रशासक शक्तिशाली मुगल बादशाहों अथवा पर्शिया के शासक शाह इस्माइल से झगड़े में नहीं फंसे। इसके अतिरिक्त, प्रारम्भिक पुर्तगाली गवर्नरों की योग्यता, उनकी नो-सेना, तोपखाना आदि भी उनकी सफलता के कारण थे।

पुर्तगालियों का पतन (Decline of the Portuguese) पुर्तगालियों के भारत में पतन के अनेक कारण थे जिनका उन्हें सामना करना पड़ा और अन्ततः उनकी शक्ति विस्तार सिमट कर गोवा, दमन और दीव तक ही रह गया । 16वीं शताब्दी में उत्तर भारत में मुगल शक्ति का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। लेकिन मुगलों ने हिन्द महासागर के व्यापार पर पुर्तगालियों के नियन्त्रण के लिए कोई खतरा उत्पन्न नहीं किया। अन्य यूरोपीय कम्पनियों के हिन्द महासागर में प्रवेश से पुर्तगाली एकाधिकार समाप्त हो गया। 1580 ई. में पुर्तगाल स्पेन के साथ सम्मिलित हो गया अपनी स्वतन्त्रता खो बैठा। बाद में अनेक स्थानों पर पुर्तगालियों को सैनिक पराजय का भी सामना करना पड़ा। 1596 ई. में दक्षिण-पूर्व एशिया में आने के बाद डचों ने पुर्तगालियों को इस क्षेत्र से बाहर कर दिया। डचों ने 1641 ई. में मलक्का दुर्ग को जीत लिया तथा 1659 ई. में श्रीलंका और 1663 ई. में मालाबार के सभी दुगर्गों पर भी उन्होंने अपना आधिपत्य कर लिया।

डचों के बाद अंग्रेजी गतिविधियों ने भी पुर्तगाली एकाधिकार को तोड़ दिया। अंग्रेजों ने 1612 ई. में पुर्तगालियों को सूरत में पराजित करके अपना कारखाना स्थापित किया। 1618 ई. में जहाँगीर से अनुमति मिलने के बाद 1628 ई. में अंग्रेजों ने अपना विस्तार करते हुए पुर्तगालियों को हरमुज में फ्रांसीसियों की सहायता से पराजित कर दिया। बाद में मुगलों और मराठों ने भी पुर्तगालियों का विरोध किया। 1629 ई. में शाहजहाँ ने उनसे हुगली छीन लिया, 1639 ई. में मराठों ने उनसे सालीसट और बेसीन छीन लिया तथा 1661 ई. में पुर्तगाल ने बम्बई अंग्रेजों को दहेज में दे दिया। पुर्तगालियों की धार्मिक कट्टरडा, धर्म-प्रचार और स्थानीय स्त्रियों से विवाह करने की नीति ने भी उनके अनेक शत्रु बना दिये । पुर्तगाली, बाद के समय में, व्यापार के प्रति उदासीन हो गये और राजनीति में अधिक हस्तक्षेप करने लगे जिससे उनकी आर्थिक शक्ति समाप्त हो गई। अन्त में, यह भी कहा जा सकता है कि पुर्तगाल यूरोप का एक छोटा सा देश था। जन-शक्ति और आर्थिक शक्ति की दृष्टि से वह इतनी दूर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित करने के सर्वथा अयोग्य था।

पुर्तगालियों का प्रभाव (Effect of the Portuguese)

हिन्द महासागर में पुर्तगालियों के प्रभाव से लगभग 50 वर्षों तक लाल सागर के माध्यम से भूमध्य सागर और वेनिस के व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। मसालों को यूरोपीय देशों में भेजने के अतिरिक्त पुर्तगाली बहुत बड़ी मात्रा में एशिया में भी मसालों का व्यापार करते थे। एशिया में घोड़ों का भी वे लोग व्यापार करते थे। केप ऑफ गुड होप मार्ग के माध्यम से पुर्तगालियों को 20% प्रतिशत का लाभ प्राप्त होता था जबकि शेष 80% प्रतिशत उन्हें अनार एशिपाई यात्राओं से प्राप्त होता था। यूरोपीय लोग 300 वर्षों तक एशियायी देशों के संसाधनों का पर्याप्त दोहन करते रहे। पहली बार भारत सहित एशिया के देशों के संसाधनों का दोहन करने वाली व्यापारिक शक्ति पुर्तगाली थे।

पुर्तगालियों ने राजनीतिक परिवर्तन का भी सूत्रपात किया था। पुर्तगालियों ने एशियाई सामुद्रिक गतिविधियों में राजनीति को समाविष्ट कर दिया। उन्होंने अपनी शक्ति स्थापना हेतु बल-प्रयोग का भी सहारा लिया और उनकी इस गतिविधि का सर्वाधिक शिकार मुसलमान हुए। मुस्लिम-विरोधी नीतियों के पीछे पुर्तगालियों की साम्प्रदायिकता की भावना उत्तरदायी थी। अपनी शक्ति स्थापना में उन्होंने अरबों और तुर्कों से सबसे पहले संघर्ष किया इसलिए उन्होंने प्रथम दृष्टि में मुसलमानों को ही अपना निशाना बनाया।

पुर्तगाली ईसाई मिशनरियों ने भारत में धर्म परिवर्तन के लिए भी प्रयत्न किये। 1540 से गोवा में प्रति सुधारवादी विचारधारा और जेसुइटों के आने से ये धर्म-परिवर्तन की गतिविधियों तीव्र हुई। इसके लिए गोवा के सभी मन्दिर भी उसी वर्ष नष्ट कर दिये गये। 1583 ई. में बारे तथा 1584 से 1587 ई. के मध्य सालसेट के मन्दिर भी तोड़ दिये गये। पुर्तगाली सरकार ईसाई पादरियों को अनेक प्रकार से सहायता देती थी। 1540 ई. में गोवा में 'ईसाई धार्मिक न्यायालय की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य ईसाई धर्म-विरोधियों को दण्डित करना था। ईसाई मिशनरियों के प्रयत्नों के कारण 16वीं शताब्दी के अन्त तक गोवा की दो-तिहाई आबादी ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था।

2. डच (THE DUTCH)

दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला-बाजार में सीधा प्रवेश प्राप्त करने के विचार से ड्चों ने 1596 ई. से कई बार सामुद्रिक यात्राएँ की थीं। अन्ततः मार्च, 1602 ई. में भारत से व्यापार करने के लिए संयुक्त डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी (United East India Company of the Netherlands) की स्थापना की। इस कम्पनी की कुल आरम्भिक पूँजी 65,00,000 गिल्डर थी। इसको केप ऑफ गुड होप के पूर्वी क्षेत्रों का व्यापार एकाधिकार सौंपा गया।

पुर्तगालियों की एशिया में स्थापित सर्वोच्चता को तोड़ने के लिए डच व्यापारियों के द्वारा पहले पुर्तगाली जहाजों (समुद्री ठिकानों) पर हमले किये गये और बाद में स्थलीय ठिकानों पर। 1605 ई. में डचों ने पुर्तगालियों से अम्बोनिया ले लिया और धीरे-धीरे 'मसाला द्वीपपुंज' (इण्डोनेशिया) में उन्हें हराकर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। डचों ने जकार्ता (वर्तमान इण्डोनेशियाई राजधानी) को जीतकर 1619 ई. में उसके खण्डहरों पर 'बैटेविया' नामक नगर भी बसाया। इससे पूर्व वे 1610 में पुलीकट और 1616 में सूरत भी जीत चुके थे।

डच्चों का शक्ति का विस्तार (Expansion of the Dutch Power)

वास्तव में कुस्तुनतुनिया के सतन के बाद हॉलैण्ड की राजधानी एम्स्टर्डम यूरोप का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन गया। हॉलैण्ड में 1609 ई. में 'एक्सजेंच बैंक' और 1614 ई. में 'क्रेडिट बैंक ऑफ एम्स्टर्डम' की स्थापना हुई जिससे प्रोत्साहित होकर हॉलैण्ड की अनेक कम्पनियों ने व्यापार में रुचि लेते हुए एशियाई बाजार में पूँजी निवेश की इच्छा व्यक्त की थी। उसी का परिणाम था। कि डच पुर्तगालियों के एकाधिकार वाले क्षेत्र में आये ।

1639 ई. में डचों ने गोवा का घेरा डाला और 1641 ई. में पुर्तगालियों से मलक्वः। जीत लिया। उन्होंने 1653 ई. में चिन्सूरो और 1658 ई. में श्रीलंका से पुर्तगालियों को निकाल दिया। डचों का 1663 में कोचीन पर भी आधिपत्य हो गया था। कोचीन के शासक से डच कम्पनी ने विशेष व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं, जिनमें पुडाकड और क्रांगनूर के मध्य के काली मिर्च के क्षेत्र का अधिकार प्रमुख था।

कोरामण्डल तट पर विजयनगर साम्राज्य के विघटन के बाद डचों ने जिजी, तंजाबूर और मदुरा के शासकों से व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त कीं। उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा में व्यापारिक कोठियाँ (फैक्ट्रियाँ) खोलीं तथा गंगा की निचली घाटी में काफी अन्दर तक चले गये। 1632 में उन्होंने हुगली क्षेत्र (बंगाल) से पुर्तगालियों को बाहर कर दिया क्योंकि उस समय बंगाल उच्च कोटि के सूती वस्त्र और उत्कृष्ट रेशम उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था। 1623 ई. में डचों ने अम्बोनियों में अंग्रेजों का वध कर दिया था जो 'अम्बोनियाँ का हत्याकाण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार उनकी पुर्तगालियों के साथ-साथ अंग्रेजों से भी शत्रुता हो गयी थी और दोनों में युद्ध होते रहे।

डचों की नाविक शक्ति पर्याप्त दृढ़ थी और धीरे-धीरे उन्होंने पुर्तगाली शक्ति को समाप्त कर दिया। 17वीं सदी में पूर्वी-समुद्र के व्यापार पर डचों का एकाधिपत्य रहा और उन्होंने अंग्रेजों या फ्रांसीसियों को अपना प्रभाव नहीं जमाने दिया। भारत में उन्होंने मसूलीपट्टम, पुलीकट, मैं अपने सूरत, चिनसुरा, कारिकल, कासिमबाजार, पटना, बालासोर, नागपट्टम और कोचीन में व्यापारिक केन्द्र स्थापित किये। परन्तु डचों का मुख्य लक्ष्य दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपों से व्यापार करने का रहा। भारत उनके व्यापारिक मार्ग की एक कड़ी मात्र ही था अतः भारत में उन्होंने अपने राजनीतिक प्रभाव को स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया। धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो गया कि डच दक्षिण-पूर्वी एशिया में और अंग्रेज भारत में अधिक आकांक्षाएँ रखते थे। अतः इसी कारण से भारत में उन्होंने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के साथ गम्भीर प्रतियोगिता नहीं की।

डच्चों का पतन (Decline of the Dutch)

लगभग तीन शताब्दियों तक पूर्वी द्वीप समूहों पर डचों का आधिपत्य रहा किन्तु अंग्रेजों ने भारत में उन्हें स्थापित नहीं होने दिया। आरम्भिक वर्षों में डचों और अंग्रेजों के सम्बन्ध अच्छे थे, किन्तु बाद में व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता के चलते दोनों एक-दूसरे के शत्रु बन गये। प्रारम्भ में डचों ने अंग्रेजों से कुछ हद तक मुकाबला भी किया परन्तु बाद में अंग्रेजों ने उन्हें भारत छोड़ने को बाध्य कर दिया ।

डच कम्पनी राष्ट्रीय अधिकारिता में थी, जिससे डच कर्मचारियों में अंग्रेजी कर्मचारियों के समान नेतृत्व की भावना और उत्साह नहीं था। डच कम्पनी के अधिकारियों का वेतन भी बहुत कम था इसलिए वे लोग अपने निजी व्यापार में अपेक्षाकृत अधिक रुचि रखते थे और कम्पनी के हितों को अनदेखा करते रहते थे। इन सब कारणों से डच कम्पनी की स्थिति निरन्तर खराब होती गयी।

दूसरी तरफ हॉलैण्ड लम्बे समय तक पराधीन रहा था इसलिए उसके पास संसाधनों की उतनी प्रचुरता नहीं थी जितनी ब्रिटेन के पास थी, क्योंकि ब्रिटेन सदा से एक स्वाधीन देश रहा था। बाद में डचों ने भारत की अपेक्षा दक्षिण-पूर्वी एशिया के मसालों के द्वीपों की ओर अपना ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया। फलतः डचों की स्थिति भारत में कम होती गयी।

यूरोप में अपनी स्थिति खराब होने और प्रतिष्ठा खो देने तथा समुद्री-क्षेत्र में अपना अधिकार खो देने के कारण भी डचों की स्थिति खराब हुई। डचों ने यूरोप के फ्रांस और इंग्लैण्ड से युद्ध किए परिणामस्वरूप उनकी शक्ति में ह्रास हुआ और वे पूर्व में अपने साम्राज्य को बनाये रखने में असफल हुए।

3. अंग्रेज(THE ENGLISH)

1580 ई. में ड्रेक ने पृथ्वी की परिक्रमा की। कुछ समय बाद 1588 ई. में अंग्रेजों ने स्पेन के जंगी जहाजों के बेड़े (अर्मीडा) पर विजय प्राप्त की। इन घटनाओं से इंग्लैण्ड के निवासी विभिन्न कार्य-क्षेत्रों में साहस और वीरता की भावना से भर उठे। इसके परिणामस्वरूप कुष्ठ अंग्रेज सामुद्रिक कप्तान पूर्वी समुद्रों में यात्रा करने को प्रोत्साहित हुए। 1591 से 1593 के माद जेम्स लकास्टर के नेतृत्व में एक बेड़ा भारत आया। वह कुमारी अंतरीप और पेनांगा पहुंचा था। 1596 ई. में दूसरा बेड़ा बेंजामिन के अधीन भारत आया। 1597 ई. में तीसरा व्यापारिक दल भारत आया, जिसका नेतृत्व एक साहसिक व्यापारी जॉन मिल्डेल ने किया था। वह पूर्व में कई वर्षों तक रहा।

इनसे प्रेरित होकर 31 दिसम्बर, 1600 ई. में इंग्लैण्ड के व्यापारियों ने रानी एलिजाबेथ में आज्ञापत्र प्राप्त करके लन्दन में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की जिसका उस समय नाम था- "दि गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेन्टस ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इन टु दि ईस्ट इण्डियन" ("The Governor and Company of Merchants of London Trading into the East India") । प्रारम्भ में इस कम्पनी को 15 वर्षों के लिए शाही अधिकार-पत्र प्राप्त हुआ था। इस चार्टर की समय-सीमा को बढ़ाने के लिए कम्पनी ब्रिटिश सरकार को आर्थिक सहायता देती थी। इस प्रकार पुर्तगाली और डचों के बाद अंग्रेजों ने पूर्व में व्यापार करना प्रारम्भ किया।

भारत में व्यापारिक कोठियों (फैक्ट्रियाँ) की स्थापना हेतु ब्रिटेन के सम्राट जेम्स ने 1608 ई. में विलियम हॉकिन्स (William Hawkins) को राजदूत के रूप में मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में भेजा। हॉकिन्स ने अंग्रेजों के सूरत में बसने की दर्खास्त (आवेदन) दी। मुगल सम्राट जहाँगीर ने उसका स्वागत करते हुए उसकी दर्खास्त मंजूर करने की इच्छा व्यक्त की थी, किन्तु पुर्तगालियों के शत्रुतापूर्ण कारनामों और सूरत के सौदागरों के विरोध के चलते हॉकिन्स का आवेदन मंजूर न हो सका। इसलिए हॉकिन्स की यह यात्रा सफल नहीं कही जा सकती, क्योंकि उसे किसी प्रकार के व्यापार प्रतिष्ठान खोलने में सफलता नहीं मिली।

अंग्रेजों का विस्तार (Expansion of the English)

1615 ई. में ब्रिटिश सम्राट ने एक क्षमता प्राप्त राजदूत को मुगल दरबार भेजने का निश्चय किया, जो मुगल बादशाह से एक व्यापारिक सन्धि कर सके। इस उद्देश्य के लिए सम्राट जेम्स प्रथम ने 'सर टॉमस रो' (Sir Thomas Roe) को चुना गया, जो 1615 से 1618 तक भारत आकर जहाँगीर के दरबार में रहा। यद्यपि उसे जहाँगीर से कोई व्यापारिक सन्धि करने में सफलता नहीं मिली तथापि तत्कालीन गुजरात के सूबेदार 'खुर्रम' (जो बाद में सम्राट शाहजहाँ बना) ने उसे व्यापारिक प्रतिष्ठान खोलने की स्वीकृति दे दी। सर टॉमस रो ने फरवरी 1619 में भारत छोड़ा। लेकिन उसके पहले ही अंग्रेज सूरत, आगरा, अहमदाबाद और भड़ौच में कोठियों स्थापित कर चुके थे। सबसे पहले अंग्रेजी व्यापारिक इकाइयाँ मसूलीपट्टम में स्थापित हुई, जबकि पश्चिम तट पर सूरत में प्रथम पैक्ट्री स्थापित हुई। ये सभी कोठियाँ सूरत की कोठी (प्रेसीडेण्ट) और कौंसिल के नियन्त्रण में रखी गयीं।

अंग्रेजों ने 1640 ई. में मद्रास के निकट सेन्ट जॉर्ज नामक दुर्ग की स्थापना की। 1651 ई. में हुगली में व्यापारिक इकाईयाँ स्थापित कीं। पूर्वी भारत में पहला अंग्रेजी औद्योगिक कारखाना 1633 ई. में उड़ीसा में हरिहरपुर (बालासोर) में खोला गया। 1632 ई. में कम्पनी को गोलकोण्डा के सुल्तान से स्वर्ण फरमान (Farman) प्राप्त हुआ, जबकि 1639 ई. में मद्रास उन्होंने (lease) पर लिया। 1622 ई. में अंग्रेजों ने ओमुर्जपुर पर कब्जा कर लिया। यह एक महत्त्वपूर्ण विजय थी, क्योंकि इसके बाद वे पुर्तगालियों के आक्रमण से सुरक्षित हो गये। 1661 ई. में ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगाली राजकुमारी केथरीन (Catherine) से विवाह कर लिया जिसमें दहेज स्वरूप उसे बम्बई टापू मिल गया। चार्ल्स ने इसे 10 पौण्ड वार्षिक के छोटे से किराये पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया। 1669 ई. और 1677 ई. के मध्य कम्पनी के गवर्नर जेराल्ड आगियर ने आधुनिक बम्बई नगर की नींव डाली। 1687 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का  मुख्यालय सूरत से बम्बई लाया गया। 1690 ई. में बंगाल के नवाब इवाहीम खां ने कम्पनी को निमन्त्रण दिया, तब कम्पनी ने सूतानरी गाँव को 'कलकत्ता' नगर के रूप में स्थापित किया। इस प्रकार कम्पनी ने 80 वर्षों में ही तीन प्रमुख बन्दरगाहों-बम्बई, मद्रास और कालिकाता पर अपना आधिपत्य कर लिया था।

धीरे-धीरे उन्होंने सूरत, आगरा, अहमदाबाद, बम्बई, पटना, कासिमबाजार, राजमहल, नावासोर, हरिहरपुर, मद्रास, कलकत्ता आदि में अपने व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये। 1698 ई. में अंग्रेजों ने एक अन्य व्यापारिक कम्पनी की स्थापना की परन्तु पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता को समाप्त करने के लिए 1702 ई. में दोनों कम्पनियों को मिलाकर एक कर दिया गया जो ईस्ट • इण्डिया कम्पनी कहलायी। 1717 ई. में इस कम्पनी ने मुगल बादशाह फर्रुखसियर से व्यापारिक अधिकारों का एक फरमान (अधिकार-पत्र) प्राप्त किया जिससे न केवल उन्हें व्यापारिक लाभ प्राप्त हुआ बल्कि जिसने अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें साम्राज्य विस्तार में भी सहायता दी। इस फरमान के द्वारा कम्पनी को मुगल बादशाह को 3,000 रुपये वार्षिक देने के बदले में हैदराबाद, गुजरात और बंगाल में बिना कर दिये हुए व्यापार करने का अधिकार प्रदान किया गया जिससे अंग्रेज कम्पनी के बंगाल के नवाब से झगड़े शुरू हुए और बंगाल में अंग्रेजी साम्राज्य की नींव पड़ी।

4. फ्रांसीसी(THE FRENCH)

भारत में व्यापारिक दृष्टि से प्रविष्ट हुए यूरोपीय देशों में सबसे अन्त में फ्रांस के व्यापारी भारत आए। यद्यपि फ्रांसीसियों में पूर्वीय व्यापार करने की इच्छा बहुत पहले जामत हुई थी, तथापि दूसरी यूरोपीय कम्पनियों के साथ पूर्व में व्यापारिक लाभों के लिए प्रतिद्वन्द्विता करने में वे यूरोपीय शक्तियों में सबसे पीछे रहे। फिर भी हेनरी चतुर्थ, रिचलू और कोलबर्ट जैसे कुछ फ्रांसीसियों ने पूर्वीय व्यापार का महत्व महसूस किया। कोल्वर्ट (Cobert) (सम्राट लुई XIV का मन्त्री) के लगातार प्रयासों के बाद 1664 ई. में फ्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हुई जिसे "कम्पनी दि इंडु ओग्गिंताल" (Companie des Indes Orientales) नाम दिया गया। इस कम्पनी पर फ्रांसीसी सरकार का प्रत्यक्ष और पूर्ण नियन्त्रण था। 1667 ई. में फ्रांसिस केरॉन की अध्यक्षता में एक अभियान दल भारत पहुँचा। 1668 में इस दल ने सूरत में 'पहली फ्रांसीसी फैक्ट्री' स्थापित की। 1669 ई. में उन्होंने भारत के पूर्वी तट स्थित मसूलीपट्टम में अपना एक कारखाना लगाया। फ्रांसिस मार्टिन को सूरत और मसूलीपट्टम का जिम्मेदारी सौंपी गयी ।

फ्रांसीसी शक्ति का विस्तार (Expansion of the French Power)

फ्रांसीसी मार्टिन ने भारत में फ्रांसीसी शक्ति का विस्तार करना प्रारम्भ किया । 1672 ई. में फ्रांसीसियों ने उसके नेतृत्व में तंजावुर के शासक से मद्रास के निकट सानवामी' को प्राप्त किया। किन्तु अगले वर्ष उसका जल सेनापति दि ला हे गोलकुण्डा के सुल्तान और डचों को संयुक्त सेना से पराजित हुआ फलतः सानथामी डचों के पास चला गया। इसी बीच मार्टिन और बेलांग दलेस्वि ने वलिकोंडापुरम के मुस्लिम सूबेदार से एक छोटा-सा गाँव मद्रास के निकट प्राप्त किया। इसी गाँव को पाण्डेचेरी के रूप फ्रांसीसियों ने 1674 ई. में विकसित किया । 1674 ई. में स्थापित पाण्डेचरी फ्रांसीसी बस्तियों का केन्द्र बन गया। इसीलिए फ्रांसिस मार्टिन को भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

बंगाल में फ्रांसीसियों ने मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ से भूमि प्राप्त करके 1690-92 में चन्द्रनगर नामक प्रसिद्ध केन्द्र को स्थापित किया। इसी समय यूरोप में डचों (अंग्रेजों द्वारा समर्थित) और फ्रांसीसियों के मध्य प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी, उसका प्रभाव भारत पर पड़ा और यहाँ दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गये। पाण्डिचेरी को डचों ने 1693 ई. में अपने आधिपत्य में ले लिया और 5 वर्षों तक अपना शासन रखा। किन्तु 1697 ई. की 'रिजविक की संधि' द्वारा यह फ्रांसीसियों को लौटा दिया गया। फ्रांसिस मार्टिन को पुनः पाण्डिचेरी का गवर्नर बनाया गया और उसकी समृद्धि को लौटा लाया और अपनी मृत्यु (1706) के पूर्व तक उसने इसे कलकत्ता से अधिक समृद्ध शहर बना दिया था।

1706 से 1720 ई. के मध्य फ्रांसीसियों की गतिविधियाँ निष्क्रिय रहीं। उन्होंने सूरत और मसूलीपट्टम की फैक्ट्रियाँ बन्द कर दीं। यह सब फ्रांस की आन्तरिक राजनीति के कारण हुआ। इस दौरान पाण्डिचेरी के पाँच गवर्नर हुए किन्तु कोई भी मार्टिन की मजबूत और बुद्धिमतापूर्ण नीति का अनुसरण नहीं कर सका। 1720 और 1742 ई. के मध्य पाण्डिचेरी के नये गवर्नर लिनो और ड्यूमा बनाये गये। उनके नेतृत्व में फ्रांसीसी कम्पनी ने पुनः विकास करते हुए समृद्धि प्राप्त की। फ्रांसीसियों ने 1721 ई. में मॉरीशस, 1725 ई. में मालाबार समुद्र तट स्थित माही और 1739 ई. में कारीकल पर अपना अधिकार करके कम्पनियाँ खोलीं ।

1742 ई. के बाद फ्रांसीसियों की नीति में आमूल परिवर्तन हुआ और उन्होंने अपना उद्देश्य साम्राज्यवाद का विस्तार बना लिया। इससे भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के मध्य संघर्ष आरम्भ हो गये। इस प्रकार पुर्तगाली, डच, फ्रान्सीसी और अंग्रेज-ये चार प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से आयीं। 16वीं सदी में पुर्तगाल का एकाधिपत्य रहा और 17वी सदी में डचों का। उनके पश्चात् 18वीं सदी में केवल अंग्रेज और फ्रांसीसी भारत के व्यापार और राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करने तथा आपस में संघर्ष करने के लिए भारत में शेष रह गये ।

5. डेन(THE DANS)

भारत में 1616 ई. में ट्रावनकोर में प्रथम डेनिस कम्पनी की स्थापना की गई थी। डेनिस कम्पनी ने 1620 में ट्रावनकोर में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित की। उसके बाद 1755 ई. में उन्होंने सेहरामपुर में भी अपने कारखाने स्थापित किये। किन्तु डेनिस कम्पनी भारत में अधिक ध्यान नहीं दे पा रही थी और दूसरी ओर अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के युद्ध के चलते उन्हें यहाँ अधिक विकास की सम्भावनाएँ दिखाई नहीं दे रही थीं। अतः डेनिस कम्पनी ने अपनी भारत की समस्त सम्पत्ति 1845 ई. में अंग्रेजों को बेच दी।

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